कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को दी एकीकृत कीट व्याधि प्रबंधन की तकनीकी जानकारी

 कृषक प्रक्षेत्र भ्रमण कर धान में कीट एवं रोगों के नियंत्रण की बताई वैज्ञानिक तकनीक

 

शहडोल। कृषि विज्ञान केंद्र शहडोल एवं किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग शहडोल के संयुक्त तत्वावधान में 29 सितम्बर 2026 को ग्राम पचड़ी एवं गौरैया टोला, विकासखंड सोहागपुर में कृषक प्रक्षेत्र भ्रमण किया गया। इस दौरान किसानों को धान की फसल में एकीकृत कीट व्याधि प्रबंधन की तकनीकी जानकारी देकर जागरूक किया गया।

कृषि विज्ञान केंद्र शहडोल के वैज्ञानिक डॉ. ब्रजकिशोर प्रजापति ने किसानों को बताया कि जिले में इन दिनों धान की फसल में तना छेदक, पत्ती लपेटक, गंधीबग एवं आभासी कंडवा रोग का प्रकोप देखा जा रहा है। उन्होंने किसानों को इन कीट एवं रोगों की पहचान तथा उनके प्रभावी नियंत्रण की तकनीकी जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि पत्ती लपेटक कीट पत्तियों को मोड़कर अंदर से हरा पदार्थ खुरचकर खाता है, जिससे पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रभावित होती है और उत्पादन में कमी आती है। वहीं तना छेदक कीट की इल्ली तने के निचले हिस्से में छेद कर अंदर प्रवेश करती है और अंदरूनी हिस्से को खा जाती है। इससे पौधे का मुख्य भाग सूखकर पीला पड़ जाता है। सूखी गोभ को खींचने पर वह आसानी से बाहर निकल आती है। बालियां बनने की अवस्था में प्रकोप होने पर बालियों में दाने नहीं बनते तथा बालियां सफेद, हल्की और सीधी खड़ी रह जाती हैं।

तना छेदक एवं पत्ती लपेटक के नियंत्रण के लिए लाइट ट्रैप या नीम ऑयल 1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर का प्रयोग करने की सलाह दी गई। इसके अलावा क्लोरएन्ट्रानीलीप्रोल (18.5 प्रतिशत एससी) 60 मिली, फ्लूबेन्डिमाईड (39.35 प्रतिशत एससी) 50 मिली, कार्टाप हाइड्रोक्लोराइड (50 प्रतिशत एससी) 400 ग्राम या इन्डोक्साकार्ब (14.5 प्रतिशत एससी) 200 मिली प्रति एकड़ की दर से 150 से 200 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने की जानकारी दी गई। अंड परभक्षी ट्राइकोग्रामा काइलोनिस को 1,00,000 से 1,50,000 प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करने की सलाह भी दी गई।

डॉ. प्रजापति ने बताया कि धान में बालियां निकलने एवं दूध भरने की अवस्था में गंधीबग का प्रकोप भी होता है। यह कीट दानों के अंदर मौजूद दूध का रस चूस लेता है, जिससे दाने खाली रह जाते हैं। कीट के रस चूसने वाले स्थान पर छोटे भूरे या काले धब्बे बन जाते हैं तथा दाने सूखकर सफेद या बदरंग होकर खाली रह जाते हैं। इससे चावल की गुणवत्ता एवं फसल उत्पादन प्रभावित होता है। इसके नियंत्रण के लिए थायोमेथाक्जाम (25 प्रतिशत डब्ल्यूजी) 40 ग्राम या इमिडाक्लोप्रिड (17.8 प्रतिशत एसएल) 60 मिली प्रति एकड़ की दर से 150 से 200 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने की सलाह दी गई।

आभासी कंडवा रोग से बचाव की दी जानकारी

धान की फसल में आभासी कंडवा रोग के संबंध में जानकारी देते हुए बताया गया कि यह बीमारी बालियों में दाना बनने की अवस्था में दिखाई देती है तथा पैदावार के साथ-साथ चावल की गुणवत्ता को भी प्रभावित करती है। रोग के प्रकोप में कुछ दाने नारंगी रंग के गोल पिंड का रूप ले लेते हैं। प्रारंभ में ये पिंड हल्के पीले, बाद में गहरे हरे और अंत में काले रंग के हो जाते हैं। काले पड़ने पर पिंड फट जाते हैं और इनमें से फफूंद के बीजाणु निकलकर हवा के माध्यम से आसपास के पौधों में फैलते हैं।

 

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